
भारतीय हॉकी के स्वर्णिम इतिहास से जुड़ा एक चमकता नाम अब हमारे बीच नहीं रहा। मॉस्को ओलंपिक 1980 में भारत को स्वर्ण पदक दिलाने वाली टीम के सदस्य दविंदर सिंह गरचा का शनिवार को निधन हो गया। वह 73 वर्ष के थे। सीने में तकलीफ के बाद उन्हें 2 जनवरी को अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां उनकी मामूली सर्जरी हुई थी। कुछ दिन बाद उन्हें छुट्टी दे दी गई थी, लेकिन शनिवार सुबह पंजाब के जालंधर स्थित अपने आवास पर उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से खेल जगत में शोक की लहर दौड़ गई।
मॉस्को ओलंपिक में रचा था इतिहास
दविंदर सिंह गरचा का जन्म 7 दिसंबर 1952 को अमृतसर में एक साधारण डेयरी किसान परिवार में हुआ था। मेहनत और जज्बे के दम पर उन्होंने भारतीय हॉकी में अपनी अलग पहचान बनाई। 1979 में मॉस्को प्री ओलंपिक टूर्नामेंट के जरिए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदार्पण किया। इसके बाद मॉस्को ओलंपिक 1980 में उन्होंने ऐसा प्रदर्शन किया जिसे आज भी याद किया जाता है। उस ओलंपिक में गरचा ने 6 मुकाबलों में 8 गोल दागे। फाइनल में स्पेन के खिलाफ 4-3 की जीत में उनका योगदान निर्णायक रहा। यह भारत का पुरुष हॉकी में अब तक का आखिरी ओलंपिक स्वर्ण पदक रहा।
अंतरराष्ट्रीय करियर और सम्मान
मॉस्को ओलंपिक से पहले कराची में हुए चैंपियंस ट्रॉफी टूर्नामेंट में भी गरचा ने भारत के लिए सबसे ज्यादा गोल किए थे। हालांकि उस टूर्नामेंट में भारतीय टीम पांचवें स्थान पर रही थी। अपने अंतरराष्ट्रीय करियर में उन्होंने 3 बड़े टूर्नामेंट में 30 से अधिक मुकाबले खेले और भारत के लिए कुल 19 गोल किए। आक्रामक खेल शैली उनकी पहचान रही। हॉकी के प्रति उनके योगदान को देखते हुए वर्ष 2021 में उन्हें ध्यान चंद पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो उनके जीवन की बड़ी उपलब्धियों में से एक था।
खेल के साथ सेवा का भी मजबूत रिश्ता
मैदान के बाहर भी दविंदर सिंह गरचा का कद उतना ही ऊंचा रहा। वह भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी थे और पंजाब पुलिस में डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल के पद तक पहुंचे। इसके साथ ही वह हॉकी के प्रचार प्रसार में भी सक्रिय रहे। वह ओलंपियन सुरजीत हॉकी सोसाइटी के अध्यक्ष थे, जो हर साल प्रतिष्ठित हॉकी टूर्नामेंट का आयोजन करती है। इसके अलावा जालंधर में होने वाले प्रसिद्ध मोहिंदर सिंह मुंशी हॉकी टूर्नामेंट के भी अध्यक्ष रहे। उनका अंतिम संस्कार 14 जनवरी को किया जाएगा। उनके जाने से भारतीय हॉकी ने अपना एक सच्चा सेवक खो दिया है।
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