
भूख, बीमारी और तंगी से लड़ती धाविका, ट्रैक पर चमकी बुशरा खान, क्या एशियन गेम्स तक पहुंचेगा सपना
भूख, बीमारी और आर्थिक तंगी से जूझती भोपाल की धाविका बुशरा खान ने खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स 2025 में गोल्ड जीतकर हौसला दिखाया। पिता की मौत के बाद भी उनका सपना एशियन गेम्स तक पहुंचने का है।
किलोमीटरों की इस दौड़ में बुशरा खान गौरी सिर्फ रेस नहीं लगातीं, बल्कि हर कदम पर अपनी किस्मत से लड़ती हैं। पिता की मौत ने परिवार की रीढ़ तोड़ दी, मां लगातार बीमार रहती हैं और घर की हालत ऐसी रही कि कई बार खाने तक का इंतजाम मुश्किल हो गया। बावजूद इसके बुशरा ने हार नहीं मानी। भोपाल की इस युवा धाविका ने हालात को अपने हौसले पर हावी नहीं होने दिया और ट्रैक को अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी ताकत बना लिया।
पिता की मौत से टूटा घर, टूटा हौसला
साल 2022 में केमिकल फैक्ट्री ब्लास्ट में बुशरा के पिता की मौत हो गई। उस वक्त बुशरा सिर्फ 18 साल की थीं। मां और छोटी बहनें घर पर थीं, जबकि बुशरा ट्रेनिंग में थीं। इस हादसे के बाद परिवार पूरी तरह आर्थिक तंगी में डूब गया। हालात इतने खराब हो गए कि बुशरा ने खेल छोड़ने तक का मन बना लिया था। उन्हें लगा कि अब परिवार संभालना ज्यादा जरूरी है, खेल सपना बनकर ही रह जाएगा।
कोच और सिस्टम ने दिया नया सहारा
यही वो दौर था, जब कोच एसके प्रसाद और मध्य प्रदेश की तत्कालीन खेल मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया ने बुशरा का हाथ थामा। उनके भरोसे और सहयोग ने बुशरा को फिर से ट्रैक पर खड़ा कर दिया। छह-सात महीने के ब्रेक के बाद बुशरा ने वापसी की और खुद को साबित किया। टीटी नगर स्थित साई सेंटर में ट्रेनिंग करते हुए उन्होंने न सिर्फ खुद को संभाला, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर पहचान भी बनाई।
गोल्ड मेडल, लेकिन सपने अब भी अधूरे
खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स 2025 में बुशरा ने 5000 मीटर में स्वर्ण और 10,000 मीटर में रजत पदक जीतकर सबको चौंका दिया। इसके बावजूद उनका संघर्ष खत्म नहीं हुआ है। एशियन गेम्स 2026 उनका अगला लक्ष्य है, लेकिन आर्थिक तंगी, मां की बीमारी और इंजरी उनकी राह में बड़ी बाधा हैं। बुशरा का सपना ओलंपिक तक पहुंचने का है, पर इसके लिए उन्हें सहयोग और संसाधनों की सख्त जरूरत है। ट्रैक पर चमकने वाली यह धाविका अब भी जिंदगी की सबसे बड़ी रेस लड़ रही है।
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