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जिस दिन दुनिया ने उसे चैंपियन कहा, वही दिन था उसका जन्मदिन — निशाद की सुनहरी छलांग ने लिखा इतिहास!

निशाद कुमार ने अपने 25वें जन्मदिन पर वर्ल्ड पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 2.14 मीटर की छलांग लगाकर स्वर्ण पदक जीता. खेतों से विश्व मंच तक की उनकी संघर्ष कहानी युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बन गई।

3 अक्टूबर 1999 को जन्मे निशाद कुमार ने अपने 25वें जन्मदिन पर ऐसा तोहफा दिया, जिस पर पूरा भारत गर्व कर रहा है. हिमाचल के ऊना जिले के छोटे से गांव बदाऊं के इस लाल ने वर्ल्ड पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 2.14 मीटर की ऊंची छलांग लगाकर देश के लिए स्वर्ण पदक जीता. यह जीत सिर्फ एक गोल्ड नहीं थी — यह उस किसान के बेटे की कहानी थी, जिसने अपने संघर्ष से सपनों को ऊंचाई दी.

पहली बार परिवार की मौजूदगी में छलका ‘सपनों का सोना’
नई दिल्ली में पहली बार आयोजित इस प्रतियोगिता में एक भावनात्मक पल तब आया, जब निशाद के पिता रछपाल सिंह, माता पुष्पा देवी और बहन रमा स्टेडियम में मौजूद थे. वर्षों बाद पहली बार उन्होंने अपने बेटे को लाइव छलांग लगाते देखा — और देखा कि कैसे उसने टोक्यो और पेरिस पैरालंपिक चैंपियन अमेरिका के राड्रिक टांसेंट को मात देकर इतिहास रचा. टांसेंट, जो अब तक अपराजेय माना जाता था, इस बार तीसरे स्थान पर रहा.

संघर्ष की कहानी: खेतों से लेकर विश्व मंच तक का सफर
सिर्फ छह साल की उम्र में चारा काटने की मशीन में हाथ गंवाने वाला बच्चा, आज भारत का मेडल मशीन बन चुका है. निशाद ने अपने संघर्ष को कभी कमजोरी नहीं बनने दिया. राज मिस्त्री पिता और गृहिणी मां के सपनों को साकार करने के लिए वह दिन-रात अभ्यास करता रहा. पंचकूला के ताऊ देवीलाल स्टेडियम में कोच नसीम अहमद ने उसकी प्रतिभा को पहचाना और निखारा.

टोक्यो से पेरिस और अब दिल्ली — हर छलांग नई ऊंचाई की ओर
पहले फाजा वर्ल्ड ग्रां प्रिक्स में स्वर्ण, फिर 2019 वर्ल्ड चैंपियनशिप में कांस्य, और उसके बाद टोक्यो व पेरिस पैरालंपिक में रजत पदक. अब इस बार अपने ही देश की धरती पर उन्होंने वर्ल्ड गोल्ड जीतकर कहानी पूरी कर दी.

आज विश्व रैंकिंग में नंबर दो पर काबिज निशाद बचपन में जमैका के उसैन बोल्ट से प्रेरित थे, लेकिन अब दुनिया के लाखों युवा निशाद से प्रेरणा ले रहे हैं — उस खिलाड़ी से, जिसने अपनी “सीमाओं” को ही अपनी “शक्ति” बना लिया.

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