
‘अजेय योद्धा से हनुमान तक’: दारा सिंह की विरासत आज भी अमर है
दारा सिंह ने कुश्ती से लेकर फिल्मों और राजनीति तक भारतीयों के दिलों में खास जगह बनाई। हनुमान के रूप में उनकी पहचान अमर है। 12 जुलाई को उनकी पुण्यतिथि पर देश एक अपराजेय योद्धा को श्रद्धांजलि देता है।
दारा सिंह भारत के उन गिने-चुने नामों में हैं, जिन्होंने न केवल देश में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारतीय कुश्ती का डंका बजाया. ‘रुस्तम-ए-पंजाब’ और ‘रुस्तम-ए-हिंद’ जैसे खिताब उन्हें उनकी अपराजेयता के लिए मिले. उन्होंने करीब 500 कुश्ती मुकाबले लड़े और कभी हार नहीं मानी. 1968 में उन्होंने अमेरिकी पहलवान लाऊ थेज को हराकर विश्व चैंपियनशिप अपने नाम की.
गामा से तुलना, विश्व मंच पर भारत की गरिमा
दारा सिंह की तुलना अक्सर गामा पहलवान से की जाती है. दोनों ही भारतीय मूल्यों, ताकत और आत्मबल के प्रतीक रहे. गामा ने जहां ब्रिटिश शासन काल में जीत से भारतीयों में गर्व की भावना भरी, वहीं दारा सिंह ने आज़ाद भारत में कुश्ती को ग्लैमर और पहचान दिलाई.
हनुमान से लेकर दादाजी तक – अभिनय का सफर
पहलवानी के बाद दारा सिंह ने फिल्मी दुनिया का रुख किया. 1952 में ‘संगदिल’ से शुरुआत की और मुमताज के साथ कई हिट फिल्में दीं. रामानंद सागर की ‘रामायण’ में हनुमान का किरदार निभाकर वे घर-घर में पूजे जाने लगे. इस किरदार के लिए उन्होंने नॉन-वेज खाना तक छोड़ दिया था.
संसद तक का सफर और सम्मान
कला और खेल से आगे बढ़ते हुए दारा सिंह राजनीति में भी सक्रिय हुए. वे पहले खिलाड़ी बने जिन्हें राज्यसभा के लिए नामित किया गया (2003-2009). साथ ही जाट महासभा के अध्यक्ष भी रहे. उन्होंने देश सेवा के हर मंच पर अपनी छाप छोड़ी.
12 जुलाई – एक योद्धा को श्रद्धांजलि
2012 में 12 जुलाई को यह महान शख्सियत इस दुनिया को अलविदा कह गई. लेकिन उनकी कुश्ती, सादगी, अभिनय और देशभक्ति की कहानी आज भी भारतीयों के दिलों में जिंदा है. दारा सिंह एक ऐसा नाम है जो ताकत, संस्कार और सम्मान का प्रतीक बन चुका है.




