क्रिकेट

नेशनल चैंपियनशिप का कड़वा सच, ठंड में टॉयलेट के पास बैठे पहलवान, सिस्टम पर उठे गंभीर सवाल

नेशनल स्कूल गेम्स रेसलिंग चैंपियनशिप के लिए जा रहे ओडिशा के युवा पहलवानों को ठंड में ट्रेन के टॉयलेट के पास बैठकर सफर करना पड़ा। कन्फर्म टिकट न मिलने से खेल व्यवस्था और सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े हो गए।

भारत में क्रिकेट के अलावा दूसरे खेलों को कितना समर्थन मिलता है, इसका एक चौंकाने वाला उदाहरण सामने आया है। ओडिशा के करीब 18 स्कूल रेसलिंग खिलाड़ियों का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें वे कड़ाके की ठंड में ट्रेन के टॉयलेट के पास जमीन पर बैठकर सफर करते नजर आ रहे हैं। ये बच्चे उत्तर प्रदेश के बलिया में आयोजित 69वें नेशनल स्कूल गेम्स रेसलिंग चैंपियनशिप में हिस्सा लेने जा रहे थे। वीडियो दिसंबर 2025 की शुरुआत का बताया जा रहा है, जिसने खेल व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

कन्फर्म टिकट नहीं, मजबूरी में सफर
वायरल वीडियो में साफ दिख रहा है कि पहलवान अपने सामान के ऊपर या फर्श पर बैठे हैं और ठंड से बचने के लिए सिर ढके हुए हैं। इस ग्रुप में करीब 8 लड़कियां भी शामिल थीं। आरोप है कि अधिकारियों ने खिलाड़ियों के टिकट कन्फर्म नहीं कराए, जिसके चलते उन्हें ट्रेन के टॉयलेट के पास सफर करना पड़ा। आने और जाने दोनों यात्राओं में उन्हें भारी परेशानी झेलनी पड़ी। बदबू और भीड़ के बीच घंटों सफर करना इन बच्चों के लिए किसी सजा से कम नहीं था।

टीटीई से भी नहीं मिली राहत
खिलाड़ियों के साथ गए एक शिक्षक ने बताया कि उन्होंने टीटीई से सीट दिलाने की पूरी कोशिश की, लेकिन शुरुआत में कोई मदद नहीं मिली। मजबूरी में खिलाड़ियों को टॉयलेट के पास बैठकर यात्रा करनी पड़ी। बाद में पश्चिम बंगाल के हिजली स्टेशन पर जाकर कहीं 10 सीटें मिल पाईं। एक पहलवान ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि ऐसी हालत में यात्रा करने के बाद अच्छा प्रदर्शन की उम्मीद कैसे की जा सकती है। हर स्टेशन पर लोगों के चढ़ने-उतरने के दौरान उन्हें अपना सामान समेटकर हटना पड़ता था।

विभाग का जवाब और उठते सवाल
मामला तूल पकड़ने के बाद स्कूल एवं जन शिक्षा विभाग ने कुप्रबंधन को लेकर रिपोर्ट मांगी है। विभाग का कहना है कि 18 खिलाड़ियों और चार शिक्षकों के लिए 3-टियर एसी कोच में टिकट बुक किए गए थे, लेकिन कन्फर्म नहीं हो सके। विभाग ने सफाई दी कि खिलाड़ियों को प्रतियोगिता से वंचित न रखने के लिए यह फैसला लिया गया। हालांकि सवाल अब भी कायम है कि जब देश के लिए खेलने वाले बच्चों को बुनियादी सुविधा नहीं मिलती, तो उनसे बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद कैसे की जा सकती है।

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