हॉकी

ब्रॉन्ज के हीरो बने कोच, लेकिन सारा क्रेडिट खिलाड़ियों को क्यों दिया?

जूनियर हॉकी वर्ल्ड कप में अर्जेंटीना को हराकर भारत ने नौ साल बाद ब्रॉन्ज जीता। कोच पीआर श्रीजेश ने सफलता का श्रेय खिलाड़ियों को दिया और कई युवाओं को सीनियर टीम के संभावित सितारे बताया।

चेन्नई में खेले गए जूनियर हॉकी वर्ल्ड कप में भारत ने अर्जेंटीना को 4-2 से हराकर ब्रॉन्ज मेडल जीता और इसके बाद हेड कोच पीआर श्रीजेश फिर से चर्चा में आ गए। एक खिलाड़ी के तौर पर भारत को दो ओलंपिक ब्रॉन्ज दिलाने वाले श्रीजेश के लिए यह पहला कोचिंग असाइनमेंट था और शुरुआत ही सफलता के साथ हुई। हालांकि, श्रीजेश ने इस जीत का पूरा श्रेय खिलाड़ियों को दिया। उनका कहना है कि उन्होंने सिर्फ अपने अनुभव साझा किए, असली लड़ाई और मेहनत खिलाड़ियों ने मैदान पर दिखाई।

नौ साल बाद ब्रॉन्ज, खास बन गया साल
यह ब्रॉन्ज मेडल इसलिए भी खास है क्योंकि भारत ने जूनियर वर्ल्ड कप में 2016 के बाद पहली बार पोडियम पर जगह बनाई है। इसके साथ ही यह साल भारतीय हॉकी के लिए ऐतिहासिक भी है, क्योंकि हॉकी इंडिया 100 साल पूरे होने का जश्न मना रही है। श्रीजेश ने माना कि सेमीफाइनल में जर्मनी के खिलाफ हार निराशाजनक रही, लेकिन ब्रॉन्ज जीतकर टीम ने खुद को साबित किया। उनके मुताबिक, जूनियर टीम का काम सीनियर टीम के लिए मजबूत खिलाड़ी तैयार करना है और मौजूदा टीम में कई ऐसे नाम हैं जो आगे बढ़ सकते हैं।

सीनियर टीम के दावेदार कौन
श्रीजेश ने कुछ नामों का जिक्र भी किया, जो भविष्य में सीनियर टीम तक पहुंच सकते हैं। उन्होंने साफ कहा कि सभी खिलाड़ी सीनियर टीम में जगह नहीं बना सकते, क्योंकि वहां पहले से मजबूत खिलाड़ी मौजूद हैं और मौके सीमित हैं। फिर भी उन्होंने गोलकीपर प्रिंसदीप सिंह, कप्तान रोहित, मिडफील्डर अंकित पाल और फॉरवर्ड अर्शदीप सिंह को ऐसे खिलाड़ी बताया, जो अगले स्तर के लिए तैयार दिखते हैं। उनके मुताबिक, इन खिलाड़ियों में आत्मविश्वास और क्षमता दोनों नजर आती है।

भारतीय हॉकी का सफर और विरासत
श्रीजेश ने भारतीय हॉकी के उतार-चढ़ाव पर भी बात की। उन्होंने कहा कि असली बदलाव तब शुरू हुआ जब भारत 2008 बीजिंग ओलंपिक के लिए क्वालिफाई नहीं कर पाया। वही दौर देश के लिए सबसे दर्दनाक था, लेकिन उसी निराशा ने नई ऊर्जा भी दी। उन्होंने कहा कि ओलंपिक में ब्रॉन्ज जीतने तक का सफर आसान नहीं था और इसके पीछे सालों की मेहनत, जुनून और समर्पण है। अब वक्त है इस विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का। श्रीजेश के मुताबिक, टोक्यो और पेरिस में टूटा मेडल का सूखा अब जूनियर खिलाड़ियों के कंधों पर आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी छोड़ गया है।

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