
FIH जूनियर वर्ल्ड कप में 9 साल बाद ब्रॉन्ज ने जगाई उम्मीद, जूनियर हॉकी ने बताया- भारत अब भी रेस में है
FIH जूनियर हॉकी वर्ल्ड कप में 9 साल बाद भारत ने ब्रॉन्ज मेडल जीतकर उम्मीद जगाई। अर्जेंटीना के खिलाफ शानदार वापसी ने दिखाया कि भारतीय हॉकी बदलाव के दौर में भी रेस में बनी हुई है।
पुरुष FIH जूनियर हॉकी वर्ल्ड कप में 9 साल बाद भारत को मिला ब्रॉन्ज मेडल सिर्फ एक पदक नहीं, बल्कि उम्मीद की बड़ी चिंगारी है। भले ही स्वर्ण पदक हाथ नहीं आया, लेकिन जिस तरह भारतीय जूनियर टीम ने दबाव में वापसी की, उसने बता दिया कि भारतीय हॉकी अभी खत्म नहीं हुई है। एक समय ऐसा था जब हर ओलंपिक में भारत से हॉकी गोल्ड की उम्मीद की जाती थी। नैचुरल घास पर खेले जाने वाले दौर में भारत की पकड़ मजबूत थी, लेकिन एस्ट्रो टर्फ के आने के बाद खेल की रफ्तार और फिजिकल डिमांड बदली और भारत पीछे छूट गया।
एस्ट्रो टर्फ ने बदली तस्वीर, यूरोप निकला आगे
घास से एस्ट्रो टर्फ पर शिफ्ट होना आसान नहीं था। जहां पहले स्टिक स्किल, ड्रिब्लिंग और शॉर्ट पास अहम थे, वहीं अब ताकत, फिटनेस और तेज सोच जरूरी हो गई। यूरोपीय देशों ने इस बदलाव को जल्दी अपनाया और नतीजे सामने आए। भारत समेत एशियाई टीमें पिछड़ गईं। हालांकि पिछले चार दशकों में भारत ने धीरे-धीरे अपनी रणनीति बदली। हॉकी इंडिया लीग, सरकारी सहयोग और स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स ने खेल को दोबारा पटरी पर लाने का काम किया। सीनियर टीम के लगातार दो ओलंपिक ब्रॉन्ज इस बदलाव का बड़ा सबूत हैं।
जर्मनी-बेल्जियम ने दिखाया फर्क
हालिया जूनियर वर्ल्ड कप ने यह भी साफ कर दिया कि यूरोप और भारत के बीच अब भी एक गैप है। जर्मनी के खिलाफ सेमीफाइनल में भारत को शारीरिक और मानसिक दोनों स्तर पर मात मिली। जर्मनी की पोजिशनिंग, क्विक डिसीजन और दबाव में खेलने की कला ने फर्क पैदा किया। बेल्जियम के खिलाफ भी भारत को यही चुनौती मिली। हालांकि गेंद पर भारतीय खिलाड़ी कमजोर नहीं थे, लेकिन बड़े मुकाबलों में सोच और मजबूती की कमी साफ दिखी। यही टूर्नामेंट युवा खिलाड़ियों के लिए सीखने का बड़ा मंच साबित हुआ।
अर्जेंटीना के खिलाफ जज़्बे की जीत
ब्रॉन्ज मेडल मैच में अर्जेंटीना के खिलाफ भारत ने असली चरित्र दिखाया। 0-2 से पीछे होने के बावजूद टीम ने आखिरी क्वार्टर में 10 मिनट के अंदर चार गोल दागकर 4-2 से मुकाबला जीत लिया। यह वही “नेवर से डाई” एटीट्यूड है, जिस पर भविष्य टिका होता है। कोच पी.आर. श्रीजेश के मार्गदर्शन में यह टीम मानसिक रूप से मजबूत होती दिखी। अर्जुन सिंह, अनमोल एक्का, अंकित पाल और मनमीत सिंह जैसे नाम इस टूर्नामेंट के बाद चर्चा में आए। यह ब्रॉन्ज इस बात का संकेत है कि सीनियर टीम के लिए टैलेंट की सप्लाई लाइन खाली नहीं है। भारत की हॉकी कहानी अभी बाकी है।
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