SAFC

बिना मैदान के बना फुटबॉल हब: मेरठ का सिसौला बुजुर्ग गांव रच रहा नई कहानी

देश में जहां क्रिकेट का बोलबाला है, वहीं उत्तर प्रदेश का एक गांव फुटबॉल को लेकर सुर्खियों में है. मेरठ का सिसौला बुजुर्ग गांव आजकल चर्चा में है, लेकिन किसी टूर्नामेंट या खिलाड़ी की वजह से नहीं, बल्कि यहां बनने वाली लाखों फुटबॉलों के कारण.

3000 परिवारों की आजीविका की डोर जुड़ी फुटबॉल से
इस गांव के करीब 3000 परिवार फुटबॉल सिलाई का काम करते हैं. यहां हर साल लगभग 11 लाख फुटबॉल बनाए जाते हैं. गांव में न कोई बड़ा मैदान है, न कोई अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी निकला है, लेकिन आज सिसौला बुजुर्ग फुटबॉल निर्माण में देशभर में पहचान बना चुका है.

शौक से शुरू हुआ, अब बना जीवन का सहारा
करीब 40 साल पहले हरि प्रकाश नाम के युवक ने मेरठ से फुटबॉल निर्माण की तकनीक सीखी और कुछ कच्चा माल गांव लाकर साथियों को जोड़ा. शुरुआत में यह महज एक शौक था, लेकिन धीरे-धीरे यह गांव की पहचान और आजीविका का प्रमुख जरिया बन गया.

लड़कियों की पढ़ाई का बना जरिया
गांव की लड़कियां भी इस काम में पीछे नहीं. तनु और नंदनी जैसी छात्राएं स्कूल से आने के बाद फुटबॉल सिलती हैं और उसी से अपनी फीस भरती हैं. नंदनी हर दिन 3-4 फुटबॉल बनाकर अपने घर का खर्च और पढ़ाई दोनों संभालती है.

महिलाएं बनीं आत्मनिर्भरता की मिसाल
दयावती और सुमन जैसी महिलाएं सालों से फुटबॉल निर्माण में लगी हैं. दयावती 20 साल से यह काम कर रही हैं, जबकि सुमन ने बताया कि वे 17 साल से इस काम में जुटी हैं. बच्चों से लेकर बड़ों तक, पूरा परिवार इस काम में भागीदारी निभा रहा है.

गांव में ही बनता है भविष्य
हरि प्रकाश के अनुसार, अब यह गांव फुटबॉल निर्माण का एक केंद्र बन चुका है. चमड़े से लेकर सिंथेटिक तक, हर तरह की गेंद यहां बनती है और देश-विदेश में जाती है. सिसौला बुजुर्ग आज साबित कर रहा है कि छोटे प्रयास बड़े बदलाव ला सकते हैं.