
डिको से पेले बनने तक: मिट्टी से उठकर आसमान को छूने की कहानी
दुनिया के सबसे महान फुटबॉलरों में शुमार ब्राजील के पेले का 82 वर्ष की उम्र में साओ पाउलो में निधन हो गया. फुटबॉल के मैदान में उन्हें “जादूगर” कहा जाता था, और उनके खेल की छाप ऐसी थी कि आज भी कोई उनके मुकाम तक नहीं पहुंच सका है.
तीन विश्व कप, एक नाम—पेले
पेले की मौजूदगी में ब्राजील ने 1958, 1962 और 1970 में फीफा विश्व कप जीता. ये कारनामा आज तक कोई अन्य खिलाड़ी नहीं दोहरा सका. उनके खेल का जादू ऐसा था कि पूरी दुनिया उनके पैरों की कलाकारी को सलाम करती थी.
पेले नहीं, एडसन था असली नाम
पेले का असली नाम था एडसन एरेंटस डो नासिमेंटो. उनका जन्म 23 अक्टूबर 1940 को ब्राजील के मिनास गेराइस में हुआ. जिस दिन उनका जन्म हुआ, उसी दिन उनके गांव में पहली बार बिजली आई थी. इस खुशी में उनके माता-पिता ने मशहूर वैज्ञानिक थॉमस एडिसन के नाम पर उनका नाम ‘एडसन’ रखा, हालांकि स्पेलिंग में चूक हो गई.
डिको से गैसोलिना तक का सफर
बचपन में पेले को घरवाले ‘डिको’ कहकर बुलाते थे. जब वे तेज़ी से मैदान में दौड़ते तो लोग उन्हें ‘गैसोलिना’ कहने लगे. वह कभी फटे कपड़ों की गेंद से खेलते, तो कभी मालगाड़ी से सामान बेचकर फुटबॉल खरीदते—लेकिन सपनों का पीछा कभी नहीं छोड़ा.
पेले नाम कैसे पड़ा, आज भी रहस्य बना है
पेले खुद इस नाम की कहानी को लेकर भ्रम में थे. उनके मामा जॉर्ज के अनुसार, एक गोलकीपर ‘बिले’ की नकल करते हुए जब डिको गोल बचाते थे, तो लोग मज़ाक में उन्हें ‘बिले’ कहने लगे. समय के साथ बिले, ‘पेले’ में बदल गया. शुरुआत में पेले इस नाम पर गुस्सा करते थे, लेकिन यही नाम आगे चलकर उनका अस्तित्व बन गया.




